Saturday, March 4, 2017

चश्म-ए-मयगू ज़रा इधर कर दे,
दस्त-ए-कुदरत को बे-असर कर दे

तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साकी
तल्खी-ए-मय को तेज़-तर कर दे

जोश-ए-वहशत है तृष्णा-ए-काम अभी
चाक-ए-दामन को ताजिगर कर दे

मेरी क़िस्मत से खेलने वाले
मुझ को क़िस्मत से बे-खबर कर दे

लूट रही है मेरी मता-ए-नियाज़्
काश वो इस तरफ नज़र कर दे

'फ़ैज़' तकमिल-ए-आरजू मालूम
हो सके तो यूँही बसर कर दे

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