Saturday, May 27, 2017

सुपरमैन,

सालों का विश्वास आज टूटने जा रहा था, और मैं दुआ कर रहा था कोई चमत्कार हो जाए| आमतौर पर मैं व्यथित नही होता पर जब बात अपने बच्चों की आती है तो मैने कई लोगों को बिखरते देखा है, ऐसा ही कुछ मैं भी महसूस कर रहा था|

कई बार होता है, हम हमारे बच्चो या छोटों के साथ बड़प्प्पन का सुलूक जब करने लगते है तो उनके मन मे आपके लिए एक विशेष स्थान बन जाता है, वो आपको एक बड़ी हस्ती के रूप मे देखने लगते हैं, जैसे आप के लिए तो कुछ भी नामुमकिन नहीं, उनका बालमन आपको एक हीरो या नायक का रूप दे देता है| एक-दो बार बाहर घूमने जाना, उँचा लगा कोई फल तोड़ कर देना, पतंग उड़ाना, गाड़ी चलाना, या इनमे से या इन जैसे ही कुछ काम के लिए शाबाशी-भर देना, ये कुछ छोटे छोटे क्रियाकलाप देख कर बच्चे आपको सुपरमैन मानने लगते है| कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ| विरेन, मेरा बेटा|

शाम मे पार्क मे खेलना बच्चों के लिए आम बात है, झूलों की लाइन मे लगना है तो पापा जल्दी लगवा देंगे, फिसलपट्टी पर उल्टा भी फिसलूंगा तो पापा पकड़ लेंगे, मेरी-गो-रॉवुंड पर तो बड़ा डर लगता है, तो चलो पापा को ले चलते है, वो साथ होंगे तो कोई बच्चा लड़ाई भी नही करेगा| उसके दिल मे कब ये बातें इस कदर तस्वीर-सी बन गई मुझे भी पता नही चला| मेरा तो पिता बनने का पहला ही अनुभव था, पर उसके लिए तो मैं सुपरमैन बन चुका था, जब तक ये बात समझ मे आई तो इस तरह आएगी कभी उम्मीद भी नही की थी|

हर रोज की तरह शाम को कुछ तरकारी ख़रीदकर मोटरसाइकल पर मॅंडी से लौट रहे थे, वो अक्सर आगे बैठकर मोटरसाइकल का हैंडल पकड़ लेता, के मुझे चलानी है, खाली सड़क देख कर मैं भी उसे पकड़ा देता, और खुश होता था| पर आज सड़क खाली नही थी, मैने उसे मना कर दिया, कुछ दूर चलकर देखा एक छोटा कुत्ते का बच्चा चिल्लाता हुआ एकदम आया, मैंने किसी तरह मोटरसाइकल को रोका पर तब तक उसे टकराने से नही रोक पाया, बेटे का बालमन समझा के उसे चोट हमारी टक्कर से लगी है| ह्म रुके और देखा कि कितनी चोट लगी है, तब तक बेटे ने लपक के उसे गोद मे उठा लिया और बेहताशा भागने लगा, मैं समझ गया वो सड़क पार वाले नर्सिंग होम को देखकर भागा है, पर वो नही जानता था कि इंसानो और जानवरो के अस्पताल अलग होते है, तब तक वो अस्पताल के काउंटर पर पहुँच चुका था, और मैं उसके पीछे, "देखो इसे भौत चोट लग गई है, खून भी आ रा है, इसे जल्दी से ठीक कर दो, कितना रो रा है ये"  उसने रेसेप्शन पे कहा, उसके इस सवाल का जवाब क्या मिलना था, मैं भी जानता था, पर कुछ बोल नही पाया, वो वही कर रहा था जो उसे पता था, "जल्दी करो ना, देखो कितना खून आ रा है इसे" वो फिर बोला | मैने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा, तभी जवाब मिला, "इसको किसी जानवरों के अस्पताल ले जाओ, यहाँ कुछ नही होगा", "पर डॉक्टर तो है ना यहाँ," उसने हिम्मत नही हारी थी, "अरे !!!! भैया जी, आपके साथ है क्या ये, समझाओ इसे, और जानवरों के अस्पताल ले जाओ" अस्पताल के एक कर्मी ने मेरी तरफ देख कर उत्तर दिया| पर ये उत्तर बेटे को समझ नही आ रहा था, और वो भी रोने लगा, जितने आँसू उसे आ रहे थे उतना मैं खुद को मजबूर समझ रहा था, "पापा, आप बोलो ना इनको, देखो इसके खून भी आ रा है" और वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगा जैसे वो उस चोट को महसूस कर रहा हो, "पापा... " बार बार उसकी पुकार और तड़प मुझे व्यथित करने लगी, पर मैं क्या करता, आस पास जानवरों का अस्पताल थोड़ा दूर था, और उस जानवर की हालत ज़्यादा अच्छी नही लग रही थी, मैं तो मन ही मन हार मान चुका था, पर बेटे की तड़प, उसकी रोती हुई आवाज़, और जिस तरह से उसने उस बच्चे को पकड़ा था, देख कर लगा, ये मैं क्या उदाहरण दे रहा हू इसे| मैने तुरंत दोनो को उठाया और मोटरसाइकिल की तरफ भागा| दस से पंद्रह मिनट मे हम जानवरों के अस्पताल मे थे, पर इस दौरान पूरे रास्ते भर दोनो लगातार रो रहे थे, एक के पास चोट की तड़प थी और दूसरे के पास इंसानियत की| बेटे का उसे पकड़ने का तरीका देखकर लगा जैंसे कोई अपने बच्चे को उठाता है| मोटरसाइकल रुकते रुकते विरेन पहले ही कूद गया था, कुछ संतुलन बिगड़ा ज़रूर, पर गिरा नहीं|
इधर मैं इस परिस्थिती मे, जहाँ विरेन उस जानवर के लिए जो कुछ कर रहा था, ये सोच कर खुश हो रहा था कि बेटे मे कुछ मानवता है, उधर ये भी सोच कर डर रहा था, कि कल ये बिना बताए अगर ऐसा कुछ कर लेगा तो क्या होगा| तब तक विरेन डॉक्‍टर से मिल चुका था, पर अब उस कुत्ते ने हिलना भी बंद कर दिया था, डाक्टर उसका इलाज करने की कोशिश मे था और विरेन मेरे पास लौट आया, "पापा, आप कुछ भी कर सकते हो ना, उसको ठीक कर दो..." कुत्ते की हालत पर तो मुझे पहले भी यकीन नहीं था, पर अब कुछ बात बदल सी गई थी, सालों का विश्वास आज लगभग टूटने जा रहा था, और मैं दुआ कर रहा था कोई चमत्कार हो जाए| आमतौर पर मैं व्यथित नही होता पर जब बात अपने बच्चों की आती है तो मैने कई लोगों को बिखरते देखा है, ऐसा ही कुछ मैं भी महसूस कर रहा था| विरेन आज उस विश्वास को आजमाना चाहता था जो पिछले 5-6 सालों मे उसने मुझ पर किया, और मुझे अब समझ आ रहा था कि अब तक मैने क्या ग़लती की है| मानसिक विचारो के अन्तर्द्वन्द्द से सनी इस खामोशी को तोड़ा डॉक्टर ने "देखिए, अभी तो जिंदा है पर ज़्यादा उम्मीद भी नही की जा सकती, काफ़ी शाम हो गई है अब आप लोग जाएँ, कल आ कर एक बार पूछ लेना"  पर विरेन को समझाना कठिन लग रहा था,  "चलो पापा, हम कल सुबह आकर देख लेंगे," उसके इस जवाब से लगा, कभी कभी ह्म अपने ही बच्चो को समझ नही पाते, विरेन इतना भी नासमझ नही|

अगले दिन मैं बिना बेटे को लिए वहाँ पहुचा तो पता लगा वो जानवर मर चुका था, अब तो ये बात मुझे बताना और भारी हो गया, पर मैने बताना ज़रूरी समझा, घर जा कर उसकी मनपसंद चॉकलेट देकर, मैने उसे पास बिठाया और समझाने लगा, बड़ी मुश्किल-सी लगी पहले, तो फिर मैने सोचा सीधे-सीधे ही बताना ठीक रहेगा, पर एक बार फिर मैं उसका जवाब सुन कर दंग रह गया | उसने कहा "हम तो उसे हॉस्पिटल भी लेके गये थे ना, लगता है उसे भोत ज़्यादा चोट लगी थी, हमे उसे सीधे दूसरे हॉस्पिटल ही लेकर जाना था ना, मैं ही उसे लेकर नही भागता तो बच जाता शायद" उसका एक एक शब्द मुझे आश्चर्यचकित कर रहा था, इतनी सी उम्र मे विश्वास के साथ समझ होना वाकई तारीफ के काबिल था, आमतौर पर उसकी ज़िद और हरकतें देखकर मुझे नही लगता था के इतना समझदार हो गया है| फिर लगा बच्चे अब बड़े हो रहे है, और हमे उनपर कुछ और भरोसा करना चाहिए, हम दोनो ही कुछ ना कुछ सीख चुके थे|

फिर से एक नयी शुरुआत होने को थी..




























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